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'मन्दिर-मस्जिद ( जगदीश बाली)

Written By राजी खुशी on 23.5.12 | 7:30 pm

23.5.12

न्सान जब पैदा होता है, वह न हिन्दु होता है, न मुस्लमान, न सिख, न इसाई, न कुछ और ! वह एक इन्सान के रूप मैं पैदा होता है ! वह न ’अल्ला हू अकबर, कह्ता है, न ’हर हर महादेव’ ! वह तो बस खुदा के घर से आया पाक दामन प्राणी होता है ! ज्यों-ज्यों वह बड़ा होता है, उसे यह सिखा दिया जाता है कि वह या तो हिन्दु है या फ़िर मुस्लमान या कोई और ! मज़हब उस्की पह्चान बन जाता है ! इस मज़हबी कश्मकश मैं वह आदमियत खो देता है ! किसी एक मज़हब का हो कर खुदा, भगवान या जिजस की पैरवी करते करते वह अल्ला से दूर हो जाता है !
कोई कहता है मन्दिर मैं मिलेगा, कोई कहता है मस्जिद में मिलेगा, किसी को गिरिजाघरों में दिखाई देता है तो किसी को दीदार होते हैं मठ बिहारों में ! मगर खुदा अगर है तो वह निवास करता है इन्सान के दिल में, उस के अच्छे कर्मों में, उस की नेक नियत में ! सन्त कबीर ने क्या खूब फ़रमाया है :

मोको कहां ढूंडे  रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में, 
न मन्दिर में न मस्जिद में न काबे कैलास में ! 

मगर इस बात को दरकिनार कर आदमी उलझा है मन्दिर और मस्जिद के विवाद में ! यों ही अगर मनिदर और मस्ज़िदें टूटती  रहीं तो बंट जाएगा ये भारत कई भागों में और इस हिन्दोस्तां के अस्तितव पर एक बहुत बड़ा सवालिया निशान लग जायेगा ! बन जाएगा एक और पकिस्तान, एक और बंगलादेश और मालूम नहीं कितने स्तान ! इस से अच्छा तो ये है कि न मन्दिर रहे न मस्जिद रहे एक मयखाना खॊल दिया जाय क्यॊंकि-
 ’मन्दिर-मस्जिद बैर कराते, मेल कराती मधुशाला’! और मयखाने से निकल कर कम से कम आदमी इन्सानियत के बोल तो बोलता है:

मन्दिर वालो मुझे मन्दिर मे पीने दो,
मस्जिद वालो मुझे मस्जिद मे पीने दो,
नहीं तो ऐसी जगह बताओ जहां खुदा नहीं !

कितनी विडम्बना की बात है कि खून के लिए तड़्पते रोगी को चन्द कतरे खून के नसीब नहीं होते और वही लहू सड़्कों पर बह रहा होता है ! उस पर प्रकाष्ठा ये कि यह लहू खुदा के नाम पर बह रहा होता है !
क्या ही अच्छा हो अगर हम सब धर्मों को अपना मानें और खुद को सब धर्मों का मानें ! क्योंकि किसी शायर ने बहुत खूब कहा है -

न हिन्दु बनेगा, न मुस्लमान बनेगा,
इन्सान की औलाद है इन्सान बनेगा !
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सत्य भी, मिथ्या भी

जीवन सत्य है या मिथ्या, यह बहस आध्यात्म की ही नहीं जीवन की भी है.जीवन को आप किस रूप में लेते हैं और उस रूप से क्या आपको वही मिलता है जो आपने चाह था.ज्यादातर मामलों में में अनुभव विपरीत आता है। जो चाह वो मिला नहीं और कई बार तो जो नहीं चाह वह मिल गया। कई बार यह भी हुआ की पूरी कोशिश की पर वह नहीं मिला और कई बार अधि अधूरी कोशिश से भी अप्रत्याशित , जिसकी उम्मीद नहीं थी वह मिला। ऐसा क्यों हुआ। जीवन यदि हमारे व्यवहार का परिणाम है तो जो करें वही मिलना चाहिए। यहीं से इस प्रश्न में मोड़ है। जीवन सिर्फ करने या हमारे स्मृतिजन्य व्यवहार का परिणाम नहीं है। वह यह है भी और इससे भिन्न भी है.उसे जानने के लिए कुछ और भी जानना होगा.
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संपत्ति

Written By RJV on 7.5.12 | 9:35 pm

7.5.12

एक बार भीष्म पितामह हस्तिनापुर में मुनि शम्पाक का सत्संग कर रहे थे। भीष्म ने प्रश्न किया, ‘मुनिवर, हम धनी और निर्धन, दोनों को किसी न किसी रूप में असंतुष्ट व दुखी देखते हैं। आपकी दृष्टि में जिसके पास अथाह धन है, जिस पर लक्ष्मी की कृपा है, वह दुखी और असंतुष्ट किस कारण रहता है।’
 मुनि शम्पाक बताते हैं, ‘आवश्यकता से अधिक धन जिसे प्राप्त हो जाता है, उसमें अहंकार आना स्वाभाविक है। अत्यधिक संपत्ति अपने साथ अनेक दुर्गुण लेकर आती है। वह सबसे पहले मति हरती है। बिना परिश्रम के जिसे असीमित धन मिल जाता है, वह कुरूप होते हुए भी खुद को रूपवान समझने लगता है, मूर्ख होते हुए भी खुद को बुद्धिमान समझने लगता है। सात्विकता और सरलता का त्याग कर वह भोग-विलास में डूब जाता है। उसकी इच्छाएं दिनोंदिन बढ़ने लगती हैं। यही उसके पतन का कारण बनता है।’ मुनि ने आगे बताया, ‘लक्ष्मी उस मूर्ख को मोह में डालती रहती है। वायु जैसे शरद ऋतु के बादलों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार लक्ष्मी उसके चित्त को हर लेती है। धन का अंधाधुंध उपभोग करते रहने के कारण अंत में एक दिन वह धनहीन हो जाता है। दरिद्र हो जाने पर उसे और अधिक कष्ट भोगने पड़ते हैं।’
 कुछ क्षण रुककर मुनि ने फिर कहा, ‘यदि धनी स्वतः धन का सत्कर्मों में उपयोग करे, संयमी व सात्विक बना रहे, धन को अपना न मानकर भगवान का दिया प्रसाद मान ले, धन का किंचित अहंकार न करे, तो धनविहीन हो जाने पर भी उसे दुख नहीं होता।
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कर्म

मनुष्‍य अनुचित और भ्रष्‍ट कर्म कर हर क्षण स्‍वयं को धोखा देता है क्‍योंकि वर्तमान कर्म ही उसके भविष्‍य के प्रारब्‍ध का आधार है। ----नीतिसार
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भूलों को स्‍वीकारना

अपनी भूलों को स्‍वीकारना उस झाड़ू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्‍थान को पहले से अधिक स्‍वच्‍छ कर देती है। ----- महात्‍मा गांधी 
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सम्‍पादकीय सम्‍पर्क

कमल दीक्षित
बी-9,फिरोज गांधी प्रेस परिसर,
इन्‍दौर ,
मध्‍य प्रदेश 452 003

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