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जाने क्या तूने कही ....

Written By मनवा on 5.6.12 | 1:51 pm

5.6.12

जाने क्या तूने कही ? जाने क्या मैंने सुनी ? बात बन्ध ही सी गयी | कभी -कभी ऐसा होता है की आप अपनी बात दूसरे तक पहुंचा तो देते हैं लेकिन वो आपकी बात समझ ही नहीं पाता | तो कभी -कभी आपको समझ नहीं आती की अगला क्या कहना चाहता है | अपनी बात को सामने वाले तक उसी रूप में पहुंचा देना | जिस रूप में आपने उसे महसूस किया है | ये इक़ हुनर है | एक दूसरे से संपर्क स्थापित करने के लिए | इस समाज में रहने के लिए हमें एकदूसरे की बात समझनी जरुरी होती है | अपनी बात को समझाने के  लिए हम भाषा को माध्यम बनाते हैं | इस सम्प्रेषण की क्रिया में सिर्फ शब्दों का आदान -प्रदान ही नहीं होता , अपितु क्रियाओं का भी आदान-प्रदान होता है | जैसे जब हम बाजार में कुछ खरीदने जाते हैं , तो जरुरी नहीं कि ग्राहक और विक्रेता के बीच लम्बी बात हो | दोनों आपस में कोई शब्द कहे बिना भी  सम्प्रेषण करते हैं | 
सम्प्रेषण के लिए आपसी समझ बहुत मायने रखती है |आप सामने वाले को क्या समझते है ? उसे भरोसमंद,चतुर और जानकार ?या उसके बारे में बुरी राय रखते है की वो बेवकूफ है कम दिमाग है आदि ....इसके अलावा सम्प्रेषण के लिए सक्रियता भी अनिवार्य है | मनुष्य द्वारा सृजित कोई भी वस्तु { घर , कविता , कहानी , पुस्तक , गीत या लगाया कोई पेड़ आदि } ये सब मनुष्य की रचना है | मनुष्य द्वारा किसी भी चीज की रचना कर लेना ही काफी नहीं  हो जाता | उस चीज के जरिये वो अपनी विशेषताओं को , अपने व्यक्तित्व को , दूसरों तक पहुंचाता है | समाज में अपनी हैसियत भी जताता है | क्योकिं उसकी बनायीं हुई वस्तु  दूसरे लोगो के लिए बनायीं गयी है, और यही वस्तु दूसरे लोगो के बीच सम्बन्ध स्थापित करती है | और सम्प्रेष्ण को सार्थक बनाती है | 
लोगों के बीच सम्प्रेषण की तुलना सिर्फ वस्तुओं और तार- संचार मात्र से भी नहीं की जा सकती , जिसमें सिर्फ शाब्दिक संदेशों  का विनिमय मात्र होता है | इक़ स्वस्थ सम्प्रेषण में भावनाएं भी अपना काम बखूबी करती है | बिन भावनाओं के तो शब्द खोखले होते है | कहते भी है ना दिल से कही बात ही दिल तक जाती है | 
सामान्यतः एक ही व्यक्ति अलग -अलग परिस्थितियों में अलग -अलग भूमिकाएं निभाता है | उदाहरण के लिए ,एक ही व्यक्ति कारखाने में प्रबन्धक, डाक्टर के लिए रोगी (यदि वो बीमार  है तो } घर में माँ का आज्ञाकारी बेटा , मेहमानों के लिए अच्छा मेजबान, आदि सभी कुछ हो सकता है |एक व्यक्ति जब अलग -अलग रूप धर कर समाज में रहता है | तो  उसकी  भूमिकाओं की अनेकता बहुत बार उनके बीच टकराव , पैदा कर देती है | उदहारण के लिए इक़ टीचर के रूप में जब कोई व्यक्ति अपने बेटे में कमियाँ देखता है तो उसका रुख कठोर हो जाता है | लेकिन जब उस बच्चे को वो अपने बेटे के रूप में देखता है तो क्रोध शांत हो जाता है |
व्यक्ति की वास्तविक इच्छाएं कुछ भी क्यों ना हो , उसके परिवेश के लोग उससे एक निश्चित ढंग के व्यवहार की अपेक्षा करते है | समाज भूमिका -निर्वाह के ढंग का नियंत्रण और मूल्यांकन करता है | वो भी अपने तरीके से |
बहरहाल हम सभी जानते,समझते हैं, की सम्प्रेषण की प्रक्रिया सफल तभी मानी जाती है| जब उसमे भाग लेने वाले पक्षों का व्यवहार उनकी पारस्परिक अपेक्षाओं को पूरा करता है | दूसरे की अपेक्षाओं का पूर्वानुमान और उनके अनुरूप व्यवहार करने की व्यक्ति की क्षमता तथा योग्यता ही उसे सफल व्यक्ति बनाती है | यानी व्यक्ति का व्यवहार कुशल होना उसकी सफलाता की गारंटी है |
बेशक , इस बात का ये मतलब बिलकुल नहीं है की , व्यवहार कुशल आदमी को हमेशा हर हाल में और हरेक के साथ विन्रम ही दिखाना चाहिए | अगर सिद्धांत और विश्वास के ऊपर आंच आने लगे तो व्यक्ति को अपने व्यवहार में कठोरता लानी ही होती है | फिर भी दैनिक जीवन में दूसरों लोगों की अपेक्षाओं का गलत अर्थ लगाना  उनकी अवहेलना करने को व्यवहार कुशलता की कमी ही माना जाता है | 
लेकिन हमें हमेशा याद रखना चाहिए की व्यक्तियों के किसी भी समूह में सभी जीवित व्यक्ति होते हैं | और उनमे से  हर इक़ की भावनाओं का समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए | समूह में परस्पर मनोवैज्ञानिक सम्पर्क की ज़रा सी कमी के भी चाहे वह थोड़े समय के लिए ही क्यों ना हो , गंभीर व अप्रत्याशित परिणाम निकल सकते हैं | इसलिए हमारी कोशिश होनी चाहिए की हम हमेशा दूसरों की भावनाओं का ख्याल रखे | ना हमारी बात से कोई आहत हो और ना हमें कोई आहत कर सके | अपनी बात ठीक तरीके से समझा सके और दूसरों की बात को भी हम भलीभांति समझ सके | की कोई ये ना कहे जाने क्या तूने कही ....ममता व्यास , भोपाल से 
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संपत्ति

Written By RJV on 7.5.12 | 9:35 pm

7.5.12

एक बार भीष्म पितामह हस्तिनापुर में मुनि शम्पाक का सत्संग कर रहे थे। भीष्म ने प्रश्न किया, ‘मुनिवर, हम धनी और निर्धन, दोनों को किसी न किसी रूप में असंतुष्ट व दुखी देखते हैं। आपकी दृष्टि में जिसके पास अथाह धन है, जिस पर लक्ष्मी की कृपा है, वह दुखी और असंतुष्ट किस कारण रहता है।’
 मुनि शम्पाक बताते हैं, ‘आवश्यकता से अधिक धन जिसे प्राप्त हो जाता है, उसमें अहंकार आना स्वाभाविक है। अत्यधिक संपत्ति अपने साथ अनेक दुर्गुण लेकर आती है। वह सबसे पहले मति हरती है। बिना परिश्रम के जिसे असीमित धन मिल जाता है, वह कुरूप होते हुए भी खुद को रूपवान समझने लगता है, मूर्ख होते हुए भी खुद को बुद्धिमान समझने लगता है। सात्विकता और सरलता का त्याग कर वह भोग-विलास में डूब जाता है। उसकी इच्छाएं दिनोंदिन बढ़ने लगती हैं। यही उसके पतन का कारण बनता है।’ मुनि ने आगे बताया, ‘लक्ष्मी उस मूर्ख को मोह में डालती रहती है। वायु जैसे शरद ऋतु के बादलों को उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार लक्ष्मी उसके चित्त को हर लेती है। धन का अंधाधुंध उपभोग करते रहने के कारण अंत में एक दिन वह धनहीन हो जाता है। दरिद्र हो जाने पर उसे और अधिक कष्ट भोगने पड़ते हैं।’
 कुछ क्षण रुककर मुनि ने फिर कहा, ‘यदि धनी स्वतः धन का सत्कर्मों में उपयोग करे, संयमी व सात्विक बना रहे, धन को अपना न मानकर भगवान का दिया प्रसाद मान ले, धन का किंचित अहंकार न करे, तो धनविहीन हो जाने पर भी उसे दुख नहीं होता।
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कर्म

मनुष्‍य अनुचित और भ्रष्‍ट कर्म कर हर क्षण स्‍वयं को धोखा देता है क्‍योंकि वर्तमान कर्म ही उसके भविष्‍य के प्रारब्‍ध का आधार है। ----नीतिसार
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भूलों को स्‍वीकारना

अपनी भूलों को स्‍वीकारना उस झाड़ू के समान है जो गंदगी को साफ कर उस स्‍थान को पहले से अधिक स्‍वच्‍छ कर देती है। ----- महात्‍मा गांधी 
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गोपनीयता

अगर हम स्‍वयं ही अपना राज गुप्‍त नहीं रख सकते तो किसी और से इसे गुप्‍त रखने की अपेक्षा कैसे कर सकते है। --- फ्रास्‍वां डे ला रोशेफोकाल्‍ड  
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जिन्दगी है शहद की मानिंद ...

Written By मनवा on 25.4.12 | 2:05 pm

25.4.12


पिछले दिनों , किसी बगीचे में इक बहुत बड़े वृक्ष को देखा मैंने | उस विशाल वृक्ष पर इक सुन्दर लता यानी बेल लिपटी हुई थी | बहुत देर तक उन्हें देखती रही और ये तय नहीं कर पायी की कौन ज्यादा सुन्दर है | और कौन किसकी सुन्दरता  बढ़ा रहा है | वृक्ष ने उस कोमल लता को अपना  सानिध्य दिया   है | या बेल ने खुद को समर्पित कर दिया वृक्ष पर | मैंने खुद ही मान लिया की कोई इक नहीं , दोनों ही सुन्दर हैं | लेकिन इक दूजे की वजह से | 
कुछ दिनों बाद , देखा की वृक्ष पर कोई बेल नहीं थी | बेल टूटी हुई सी सड़क किनारे पड़ी थी | और वृक्ष भी सूना- सूना सा डरावना सा लग रहा था | बगीचे के माली से पूछने पर उसने बताया की बेल को कीड़े वाला कोई पौधों का रोग हो गया था | कहीं वृक्ष भी इससे प्रभावित ना  हो जाए | इसलिए बेल को ही तोड़ कर फेंक दिया गया था | 
मैं बहुत देर सोचती रही | माली को , रोग का इलाज करना था | उसे ठीक करना था | उसने तो वृक्ष को बेल से अलग ही कर दिया | क्यों किया उसने ऐसा ?
दोस्तों , असल जिन्दगी में भी तो हम आजकल यही कर रहे है ना | आये दिन टूटते विवाह | बढ़ते तलाक | ह्त्या , आत्महत्या |  और किसी को चोट पहुंचाने या उसे जिन्दगी से अलग कर देने या खुद को दुख देकर हम हर समस्याओं के हल ढूंढ़ रहे है | 
लेकिन , हल तो फिर भी नहीं मिलते हमें | अगर , किसी को जिन्दगी से अलग कर देने से या खुद को किसी की जिन्दगी से दूर करने से ही समाधान हो जाते तो आज दुनिया में कितनी शान्ति होती | 
क्या हमने कभी सोचा| की हमारे साथी , मित्र , भाई , बहन या कोई भी आसपास रहने वाले व्यक्ति का व्यवहार हमारे  प्रति , समाज के प्रति अचानक से क्यों बदल गया ?जो कल तक जान से ज्यादा प्रेम कर रहा था | वो आज जान का दुश्मन कैसे हो गया ? चलिए सीधी बात करती हूँ |
पिछले दिनों , विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस था | और इस संगठन के अनुसार सारी दुनिया में मानसिक रोगियों की संख्या इकदम से बढ़ गयी है | और इन्हीं मानसिक रोगों की वजह से रिश्तों में दरारे  आ रही हैं | 
आधुनिकता की दौड़ | इकदूजे को नीचा दिखाने की होड़ | पैसा | झूठी शान | दिखावे की जिन्दगी ने | और समय की कमी ने लोगों को  बहुत सी मानसिक बीमारियाँ दी है | जैसे -फोबिया , मूड डिस-आर्डर , काग्नेटिवडिस -आर्डर , साइजो-प्रेनिया ,  अल्कोहल पर निर्भरता और डिप्रेशन |ये तो सिर्फ चंद नाम है | फेहरिस्त बहुत लम्बी है | 
इन रोगों की वजह से आये दिन समाज में , रिश्ते उलझ रहे है | टूट रहे हैं | कारण समझ नहीं आते लेकिन ये हो रहा है |
दरअसल , देह के रोग दिखते हैं | उसके लक्षण भी नजर आते हैं | लेकिन मन के रोग नहीं दिखते | कोई ये कैसे बताये की वो कितने किलोग्राम दुखी है | की उसके मन पर दर्द की कितनी दरारें हैं | उसके दिमाग में कितनी अशांति है | उसे नापने के लिए कोई पैमाना नहीं किसी डॉक्टर के पास | 
मन के विकारों को तो रोगी अपने विचारों , भावनाओं तथा व्यवहार से ही प्रकट करेगा ना ?
ये बात तो सिर्फ और सिर्फ वही व्यक्ति जान सकता है | जो बहुत करीब हो | जो उसे समझे | लेकिन किसी के मन को समझना क्या आसान है ? मन का  कोई रूप नहीं | आकर नहीं | सीमाएं नहीं | और इससे बड़ी बात ये की किसी के पास अब धैर्य नहीं | समझ भी नहीं | कोई किसी को समझाना नहीं चाहता और ना ही समझना   चाहता है | 
किसी के मन की विचित्र स्थिति को भांप लेना | और विवेक से समाधान निकालना कोई नहीं चाहता | उलटे इसे पूर्वजन्मों के पाप | टोने टोटके | भूत- प्रेत और ग्रहों का फेर  कहा जाता है | और पंडित , तांत्रिक , ओझा खूब इसका फायदा उठा रहे हैं | रत्न , ताबीज , यंत्र और फेंगशुई का कारोबार खूब चल निकला है | हाँ कुछ लोग चिकित्सा का सहारा भी लेते है | पर सिर्फ दवा से मन के घाव कैसे भरेगे ?
जरुरत है साथी के व्यवहार में आये असुन्तुलन के पीछे छिपे दर्द को देखने की | ना की दोषारोपण करने की | मन के रोगी को प्रेम की जरुरत होती है | हमारे स्नेह की | आत्मीयता की | हमदर्दी की | सहानुभूति की | और जब ये नहीं मिलता तो मन की हालत बिगड़ती जाती है |
इसी के चलते , हर व्यक्ति मन की सूखे टुकड़े को हरा करने के प्रयास करने लगता है |  कोई तो मुझे समझे | कोई तो मन के तल तक पहुंचे | ये विचार ही नए नए रिश्ते बनने -बनाने का सबब बनता है | 
हम घर का सामान , कपडे , जूते, कार , गहने  खरीदते समय उन चीजों को सौ बार उलट पलट कर देखते हैं | लेकिन जो साथी आपके साथ इक पूरी जिन्दगी बिता रहा है | उसके चेहरे को गौर से देखते तक नहीं |
जिन्दगी की भागदौड में कौन कितने पीछे छूट गया ज़रा देखीये तो सही | कौनसा सिरा उलझ गया और कौन कहा भटक गया देखे तो ज़रा | आखरी बार कब हँसे थे जी खोल कर सोचे ज़रा | किसी के होठों पर कब मुस्काने आई हमारी वजह से | याद है ? 
वृक्ष पर लिपटी लता वृक्ष के कारण सुन्दर नहींवो इसलिए सुन्दर है की वृक्ष उसे रोकता नहीं फैलने से | लिपटने से | जैसे साहिल से सट कर जो दरिया बहता है उसे बहने दिया जाए हम क्यों रुख मोड़ते है | बहते दरिया का |  मन की गांठे , प्रेम के स्पर्श से ही खुलती है | दो बोल प्यार के जादू भरा असर करते है | और दो कड़वे बोल किसी का दिल छलनी कर देते है | लेकिन किसी भी डाक्टर के पास  ऐसी कोई मशीन नहीं जिसमे ये छेद या सुराख़ दिखे | 
तो क्यों ना  हम , किताबों की जगह किसी का मन पढ़े | सामानों की जगह दिलों की देखभाल करे | दीवाली पर हजारों दिए रोशन करने से बेहतर है | अपने मन में प्रेम की लों जलाये | और अन्तिम बात जगजीत की गजल के साथ की " शहद जीने का मिला करता है थोड़ा -थोड़ा | " इस शहद को संभाल के रखे हम | है ना ? जिन्दगी  है शहद की मानिंद ...                           ममता व्यास, भोपाल 
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खोलो दिलों के बंधन , अजी कुछ तो बोलो

बचपन  में हम सभी ने इक़ कहानी सुनी थी | इक़ राजा था जिसके सर पे इक़ सींग था | ये बात सिर्फ उसका नाई { बाल काटने वाला } ही जानता था | राजा के कठोर आदेश थे,  की ये बात कभी भी किसी से नहीं कही जाए | मनोविज्ञान कहता  है|  की आप अपने दिल और दिमाग  से जिस काम को करने के लिए मना करेगे | वो वही करेगा | नाई ये राज कब तक अपने मन में रखता | इक़ दिन वो अपनी बात को किसी के साथ  बांटने के लिए तड़प उठा | और घने जंगल में इक़ पेड़ से वो बात कह दी | बरसों बाद उस पेड़ की लकड़ी से तबले , ढोलक  बनाये गए | और किसी  संगीत कार ने जब उन्हें राजा के सामने बजाया तो | जानते है क्या हुआ ? तबला , ढोलक सभी ने  नाई की बात को दोहरा दिया | की राजा के सर पे सींग है | राजा हैरान और नाई परेशान की ये क्या हुआ | कैसे हुआ | 
उसे ये शेर याद आया  होगा की " कभी कहा नहीं किसी से तेरे फ़साने को | ना जाने  कैसे खबर हो गयी  जमाने को " |  ये बात शुरू करने का महज बहाना  था | असल बात तो ये है की | हमारी अनुभूतियाँ , हमारे अहसास , हमारी भावनाए , अगर हम किसी के साथ नहीं बांटते तो वे किसी ना किसी रूप में व्यक्त हो ही जाती है |यहाँ तक की प्रकृति भी खुद को व्यक्त कर देती है | जैसे  समन्दर  अपने अहसास, अपने दर्द को अपने आसुओं को ,नमक में बदल देता है | उसकी आह, भाप बनकर आसमान तक जाती है | उसकी तड़प , बैचेनी  लहरें बनकर फ़ैलती है | पहाड़  अपने चेहरे पर कितना दर्द लिए होते है | उनकी इक़ इक़ परत को ध्यान से देखो | प्रेम से छुओं तो सांस लेते से लगेगे | फूल , खुश्बू के   बहाने व्यक्त होते हैं | आसमान , बूंदों  के माध्यम से प्रेम पत्र लिखता है | पंछी , नदिया , पवन के झोकें  जब सभी खुद को उजागर कर देते है तो हम इन्सान क्यों खुद  को छिपाते है | 
 कहते है शब्द अमर है | मैं कहती हूँ अनुभूतियाँ  अमर है |अव्यक्त भाव , अनुभूतियाँ गर व्यक्त ना हो तो रोग की शक्ल ले लेती है |  और अब विज्ञान भी कहने लगा, की देह की सभी बीमारियाँ  पहले मन के धरातल पर ही जन्मती है | दिमाग  का ज्यादा इस्तेमाल करने वालों को | तर्क में उलझे हुए लोगो को अक्सर दिमाग के रोग और दिल पे हर बात लेने वाले को दिल के रोग होते है | अपनी अनुभूतियों को दबाकर , छिपाकर ,कुंठाग्रस्त होने से बेहतर है हम किसी से कह दे | अपना  हाले दिल .......
जबसे लोग ज्यादा बुद्धिजीवी हो गए | समझदार हो गए | ज्ञानी हो गए | प्रसिद्ध हो गए | बड़े बन जाने  का रोग  लग गया | उसी पल से लोगो ने खुद को छिपाना  शुरू  कर दिया  |  खुल के हंसना नहीं | खुल के रोना नहीं | जोर से बात नहीं करना |  ऐसे लोग सारी उमर बड़ी ही अदा और बनावटी पन  से अपने काम करते है | अपने भीतर किसी को आने नहीं देना | किसी से भी आत्मीय नहीं होना | आत्मीय होने के बड़े खतरे है ना | कोई आपके भीतर झाँक के देख लेगा तो ....?  भेद , भेद नहीं रह पायेगे | कमजोरिया , कमियाँ दिख  पड़ेगी | क्या कहेगे लोग?  क्या छवि  बनायेगे ? क्या प्रतिक्रियां  होगी ? जान लेंगे सब | ये डर , ये संशय , बुद्धि और समझदारी , सभी अनुभूतियों को छिपा देती हैं | और लोग जीवन भर इनकी ओट में सुबकते रहते हैं | सिसकते रहते है | अपने अपराधबोध , अपनी पीडाएं , अपने दर्द को अपने डर , अपनी कुंठाओं के साथ ,  अनकहे  की  पीड़ा के वजन को ढ़ोते रहते हैं | और इक़ दिन इसी बोझ के साथ दुनिया से चले जाते है | लेकिन लेकिन लेकिन ...........
तो क्यों चुप रहा जाए | अपनी भावनाओं  के रेगिस्तान में रेत -रेत होकर होकर क्यों बिखरे ? जैसे है वैसे क्यों ना दिखे | दिन भर हँसने , हंसाने   का ढोंग करना और रातों को छुप छुप के  रो लेना क्या ठीक है ? टूट ना जाये इसलिए लोहे के कवच पहन लिए | गिरने के डर से जमीन पे ही सो गए | क्यों ? प्रेम में होना चाहते है | प्रेम में गिरने से डरते है | कहने से डरते हैं | अपने सर पर हमेशा अपने अहम् का मुकुट सजाये  फिरते हैं | कवि है तो कविता की ओट में छुप जायेगे | दार्शनिक है तो दर्शन में | जोगी , तो जोग में | योगी है तो योग में | जादूगर है तो जादू में | खिलाड़ी है तो खेल में | लेकिन साहब - खेल के बाद , तमाशे के बाद , महफ़िल उठ जाने के बाद , भीड़  के चले जाने के बाद  फिर अकेले | अपनी अनुभूतियों के साथ | हजारों की भीड़ में क्यों तन्हा हो गए ? इसलिए की  किसी से कहते नहीं कुछ भी | खुद को  क्यों छिपाए ? अच्छा लगे तो कह दे | बुरा लगे तो भी कह दे | जो अनुभव करे उसे व्यक्त करे | अनकहे के बोझ तले दब कर क्यों मरे ? ये चुप सी क्यों लगी है ? अजी कुछ तो बोलिए । खोलो  दिलों के बंधन , अजी कुछ तो बोलो  ----ममता व्यास ,  भोपाल 
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हाल कैसा है जनाब का ?

Written By मनवा on 13.4.12 | 6:30 pm

13.4.12


हम जब भी किसी से मिलते हैं | सबसे पहले पूछते हैं | क्या हालचाल है आपके ? इसके पीछे हमारी मंशा , सामने वाले की मनोदशा के बारे में जानने की होती है | अक्सर लोग ओपचारिकता  वश कह देते  हैं | हम ठीक है | लेकिन किसी भी व्यक्ति की  मनोदशा हमेशा इक़ जैसी नहीं होती | पल -पल मूड बदलता रहता है | पल -पल मूड बदलना | कभी ख़ुशी -कभी गम मनुष्य के सामान्य व्यवहार  के लक्षण है | लेकिन लगातार दुखी रहना | विषाद में घिरे रहना | या बिना कारण के हंसते रहना | ये असामान्य व्यवहार  के चिन्ह होते है | ये मनोदशा विकृति की श्रेणी में आता है | ये एक तरह  की मानसिक विकृति है | जिसमे व्यक्ति के भाव , संवेग एवं सम्बंधित मानसिक दशाओं में इतना उतार चढ़ाव होता है की व्यक्ति अपने दिन प्रतिदिन के जीवन में समायोजन का सामान्य स्तर बना कर नहीं रख पाता | नतीजा ये होता है की उसका  घर -परिवार , कार्य -क्षेत्र और सामाजिक जीवन तहस -नहस होने लगता है |
इन्डियन  अकेडमी आफ क्लिनिकल साईं -क्रेटी के एक नवीनतम अध्ययन जिसे २००० में प्रकाशित किया गया | के अनुसार भारत की  सामान्य जनसँख्या का करीब ५ प्रतिशत या लगभग पाँच करोड़ भारतीयों में मनोदशा विकृति का रोग पाया जाता है | ये समाचार हिंदुस्तान टाइम्स  के १० अक्तूबर २००० के अंक में प्रकाशित हुआ |
भारत ही नहीं विदेशों में भी मानसिक विकृति के बढ़ते ग्राफ को देख , अमेरिकन मनश्चिकित्सक संघ ने वर्गीकरण तंत्र का प्रकाशन किया | जिसका नाम " डायग्नोस्टिक एंड स्टेस्टिस्तिक  मैनुअल  आफ मेंटल डिसऑर्डर " रखा गया | इस वर्गीकरण तंत्र के अनुसार व्यक्ति में तीन तरह  की मनोविकृति पाई जाती है | इक़ धुव्रीय  विकृति यानि unipolar disorder इस विकृति में व्यक्ति उदासी और विषाद से घिरा रहता है | उसे भूख , नींद और वजन में कमी की शिकायत होती है | दूसरी विकृति है द्वि धुव्रीय यानि bipolar disorder इस विकृति में व्यक्ति उन्माद एवं विषाद दोनों अवस्थाओं में इक़ साथ रहता है | वो कभी हँसता है कभी रोता है | और तीसरी विकृति का नाम है मनोदशा विकृति यानि mood disorder इस विकृति में दैहिक एवं मानसिक विकृतियों को रखा गया है | इक़ उदाहरण देखीये | ओल्त्मानस तथा इमेरी १९९५ द्वारा  उद्धत किया गया है | " काथी नामक ३१ वर्षीय  विवाहित महिला थी | जो कामकाजी एवं मेहनती महिला भी थी | जिस फर्म  में वो काम करती थी | उसे वहां एक  तेज तर्रार  महिला समझा जाता था | उसके काम को देख कर उसे पदोंन्नति  दे दी गयी | लेकिन वो अपनी इस पदोंन्नती से ज़रा भी खुश नहीं थी | वो खुद को इस काबिल समझती ही नहीं थी | कई महीने वो निराश रही | थकी -थकी सी , चिडचिडी सी और गुमसुम भी | आफिस के सहयोगियों ने उसके इस व्यवहार पर चिंता जताई तो उसने उनसे भी दूरी बनानी शुरू कर दी | हार कर वो सभी भी उस महिला से दूर होते गए | उसकी निराशा का स्तर इतना बढ़  गया की उसे अब काम भी बोझ लगने लगा | वो खुद को योग्य समझने लगी और बीमार हूँ ऐसा कह कर घर पर बैठ गयी | यानी नौकरी छोड़ दी | उससे मिलने आने वाले दोस्तों ने भी उसमे अब रूचि लेना छोड़ दिया था | वो महिला सारा दिन टी.वी . देखती लेकिन उसे कोई रूचि नहीं थी की वो क्या देख रही है | कभी कभी उसके मन में आत्महत्या के विचार भी आते थे | लेकिन वो मरने से डरती भी थी | उसे अब अपना जीवन ही बोझ लगने लगा था | केस उदाहरण के गहन अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है की काथी  नामक महिला  मेजर डिपप्रेसिव डिसआर्डर  से जूझ रही थी | 
इसी तरह का इक़ उदाहरण पिछले दिनों दिल्ली के नोएडा  शहर में देखने को मिला था | जहाँ दो बहनों ने खुद को इक़ कमरे में बंद कर लिया था |  दोनों  अपने पिता की मौत से दुखी थी | और भाइयों की बेरुखी से आह़त थी | दोनों  ने अपनी नौकरी  भी छोड़ दी और लोगो से मिलना जुलना भी छोड़ दिया था | अकेलापन , समाज से दूरी और निराशा- अवसाद से दोनों बुरी तरह घिरी थी | उनके घर कोई भी आता जाता नहीं था |  इक़ दिन  पड़ोसियों ने जाकर देखा तो इक़ बहन की मौत हो चुकी थी और दूसरी मरने की स्थिति में  थी | हमारे आसपास ऐसे हजारों उदाहरण मिल जायेगे | 
इन तमाम विकृतियों के उपचार मनोविज्ञान में ही मिलते है | इन मनोविकृतियों  का उपचार मनोविज्ञान द्वारा ही संभव है | जिनमे योग थेरपी ,संज्ञानात्मक चिकित्सा , व्यवहार चिकित्सा , अंतर्वैयक्तिक चिकित्सा द्वारा ही संभव है | अक्सर हम अपने  परिवार में , आसपड़ोस में या कार्य - क्षेत्र में ऐसे व्यक्तियों से रूबरू होते है | 
जिनका  व्यवहार आसामान्य दिखता है | उदाहरण के लिए परिवार की  कोई महिला या पुरुष लगातार तनाव में दिखे कभी हँसे कभी गहरी उदासी में डूब जाए | खुद को समाज से अलग थलग कर बैठे | निराशा की बाते करे , नशा करे ऐसी हालत में उसे किसी मनोचिकित्सक के पास  लेजाना  जरुरी हो जाता है | उसके पास प्यार से जाकर उसकी  मनोदशा समझनी चाहिए | उसका हाल पूछना  चाहिए | हमारा प्रेम पूर्ण व्यवहार किसी के जीवन में रोशनी ला सकता है | उसे नया जीवन दे सकता है | तो चलिए ना आज पूछते है किसी से  हाल कैसा है जनाब का ? --ममता व्यास भोपाल 
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राजी खुशी

Written By RJV on 15.2.12 | 11:11 pm

15.2.12



राजी खुशी
प्रकाशक
कमल दीक्षित
बी-9, फिरोज गांधी प्रेस परिसर,
इन्‍दौर-452003
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आवागमन

सम्‍पादकीय सम्‍पर्क

कमल दीक्षित
बी-9,फिरोज गांधी प्रेस परिसर,
इन्‍दौर ,
मध्‍य प्रदेश 452 003

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